नर्मदाष्टक
स्तोत्र · 🌺 देवी · Sanskrit · ⏱ 1 min
अन्य नाम · Also known as नर्मदाष्टक · Narmadashtak
शंकराचार्य रचीत : ॥ नर्मदाष्टकम् ॥
सविन्दुसिन्धु-सुस्खलत्तरंगभंग-रंजितं ,
द्विषत्सुपापजात-जातकारि वारिसंयुतम् ।
कृतान्त-दूतकालभूत-भीतिहारि वर्मदे ,
त्वदीयपाद पंकजं नमामि देवि नर्मदे ॥ १ ॥
त्वदम्बु-लीन-दीन-मीन-दिव्यसम्प्रदायकं,
कलौ मलौध-भारहारि सर्वतीर्थनायकम् ।
सुमत्स्य-कच्छ-नक्र्र-चक्र-चक्रवाक-शर्मदे ॥
त्वदीयपाद पंकजं० ॥ २ ॥
महागभीर-नीरपूर पापधूत-भूतलं ,
घ्वनत्-समस्त-पातकारि-दारितापदाचलम् ।
जगल्लये महाभये मृकण्डुसूनु-हर्म्यदे ॥
त्वदीयपाद पंकज० ॥ ३ ॥
गतं तदैव मे भयं त्वदम्बु वीक्षितं यदा,
मृकण्डसूनु-शौनकासुरारिसेवि सर्वदा ।
पुवर्भवाब्धि-जन्मजं भवाब्धि-दु:खवर्मदे ॥
त्वदीयपाद पंकज० ॥ ४ ॥
अलक्ष-लक्ष-किन्नरामरासुरादिपूजितं ,
सुलक्ष नीरतीर-धीरपक्षि-लक्षकूजितम् ।
वशिष्ठशिष्ट-पिप्पलाद-कर्दमादि शर्मदे ॥
त्वदीयपाद पंकजं० ॥ ५ ॥
सनत्कुमार-नाचिकेत कश्यपात्रि-षट्पदै-
र्घृतं स्वकीयमानसेषु नारदादिषट्पदै: ।
रवीनदु-रन्तिदेव-देवराज-कर्म शर्मदे ॥
त्वदीयपाद पंकजं० ॥ ६ ॥
अलक्षलक्ष-लक्षपाप-लक्ष-सार-सायुधं ,
ततस्तु जीव-जन्तुतन्तु मुक्तिमुक्तिदायकं ।
विरञ्चि-विष्णु-शंकर-स्वकीयधाम वर्मदे ॥
त्वदीयपाद पंकजं० ॥ ७ ॥
अहो%मृतं स्वनं श्रुतं महेशकेशजातटे ,
किरात सूत-वाडवेषु पण्डिते शठे नटे ।
दुरन्त-पाप-ताप-हारि-सर्वजन्तु-शर्मदे ॥
त्वदीयपाद पंकजं० ॥ ८ ॥
इदन्तु नर्मदाष्टकं त्रिकालमेव ये सदा
पठन्ति ते निरन्तरं न यान्ति दुर्गति कदा ।
सुलभ्य देहदुर्लभं महेशधाम गौरवं
पुनर्भवा नरा न वै विलोकयन्ति रौरवम् ॥ ९ ॥
गुजराती विकिस्रोत — "नर्मदाष्टक" (નર્મદાષ્ટક), Dohavali and Anya pado.pdf, संस्करण 208120. मूल गुजराती लिपि से देवनागरी में लिप्यंतरित। CC BY-SA 4.0.
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Sanskrit text attributed to आदिशङ्कराचार्यः from The Works of Sri Sankaracharya, Volume 17 (Stotras, Vol. 1), Sri Vani Vilas Press, 1910.
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