सुवर्णमालास्तुतिः
स्तोत्र · Sanskrit · ⏱ 6 min
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Sanskrit text attributed to आदिशङ्कराचार्यः from The Works of Sri Sankaracharya, Volume 17 (Stotras, Vol. 1), Sri Vani Vilas Press, 1910.
अथ कथमपि मद्रसनां त्वद्गुण-
लेशैर्विशोधयामि विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १ ॥
आखण्डलमदखण्डनपण्डित
तण्डुप्रिय चण्डीश विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २ ॥
इभचर्माम्बर शम्बररिपुवपु-
रपहरणोज्ज्वलनयन विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ३ ॥
ईश गिरीश नरेश परेश म-
हेश बिलेशयभूषण भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४ ॥
उमया दिव्यसुमङ्गलविग्रह-
यालिङ्गितवामाङ्ग विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ५ ॥
ऊरीकुरु मामज्ञमनाथं
दूरीकुरु मे दुरितं भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ६ ॥
ऋषिवरमानसहंस चराचर-
जननस्थितिलयकारण भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ७ ॥
ऋक्षाधीशकिरीट महोक्षा-
रूढ विधृतरुद्राक्ष विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ८ ॥
ऌवर्णद्वन्द्वमवृन्तसुकुसुममि-
वाङ्घ्रौ तवार्पयामि विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ९ ॥
एकं सदिति श्रुत्या त्वमेव
सदसीत्युपास्महे मृड भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १० ॥
ऐक्यं निजभक्तेभ्यो वितरसि
विश्वंभरोऽत्र साक्षी भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ११ ॥
ओमिति तव निर्देष्ट्री माया-
स्माकं मृडोपकर्त्री भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १२ ॥
औदास्यं स्फुटयति विषयेषु दि-
गम्बरता च तवैव विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १३ ॥
अन्तःकरणविशुद्धिं भक्ति
च त्वयि सतीं प्रदेहि विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १४ ॥
अस्तोपाधिसमस्तव्यस्तै
रूपैर्जगन्मयोऽसि विभो
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १५ ॥
करुणावरुणालय मयि दास उ-
दासस्तवोचितो न हि भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १६ ॥
खलसहवासं विघटय घटय स-
तामेव सङ्गमनिशं भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १७ ॥
गरलं जगदुपकृतये गिलितं
भवता समोऽस्ति कोऽत्र विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १८ ॥
घनसारगौरगात्र प्रचुरज-
टाजूटबद्धगङ्ग विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ १९ ॥
ज्ञप्तिः सर्वशरीरेष्वखण्डि-
ता या विभाति सा त्वं भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २० ॥
चपलं मम हृदयकपिं विषय-
द्रुचरं दृढं बधान विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २१ ॥
छाया स्थाणोरपि तव तापं
नमतां हरत्यहो शिव भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २२ ॥
जय कैलासनिवास प्रमथग-
णाधीश भूसुरार्चित भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २३ ॥
झणुतकझङ्किणुझणुतत्किटतक-
शब्दैर्नटसि महानट भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २४ ॥
ज्ञानं विक्षेपावृतिरहितं
कुरु मे गुरुस्त्वमेव विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २५ ॥
टङ्कारस्तव धनुषो दलयति
हृदयं द्विषामशनिरिव भो
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २६ ॥
ठाकृतिरिव तव माया बहिर-
न्तः शून्यरूपिणी खलु भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २७ ॥
डम्बरमम्बुरुहामपि दलय-
त्यनघं त्वदङ्घ्रियुगलं भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २८ ॥
ढक्काक्षसूत्रशूलद्रुहिणक-
रोटीसमुल्लसत्कर भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ २९ ॥
णाकारगर्भिणी चेच्छुभदा
ते शरगतिर्नृणामिह भो
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ३० ॥
तव मन्वतिसंजपतः सद्य-
स्तरति नरो हि भवाब्धि भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ३१ ॥
धूत्कारस्तस्य मुखे भूया-
त्ते नाम नास्ति यस्य विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ३२ ॥
दयनीयश्च दयालुः कोऽस्ति म-
दन्यस्त्वदन्य इह वद भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ३३ ॥
धर्मस्थापनदक्ष त्र्यक्ष गु-
रो दक्षयज्ञशिक्षक भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ३४ ॥
ननु ताडितोऽसि धनुषा लुब्धधि-
या त्वं पुरा नरेण विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ३५ ॥
परिमातुं तव मूर्तिं नालम-
जस्तत्परात्परोऽसि विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ३६ ॥
फलमिह नृतया जनुषस्त्वत्पद-
सेवा सनातनेश विभो।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ३७ ॥
बलमारोग्यं चायुस्त्वद्गुण-
रुचितां चिरं प्रदेहि विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ३८ ॥
भगवन्भर्ग भयापह भूतप-
ते भूतिभूषिताङ्ग विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ३९ ॥
महिमा तव न हि माति श्रुतिषु हि-
मानीधरात्मजाधव भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४० ॥
यमनियमादिभिरङ्गैर्यमिनो
हृदये भजन्ति स त्वं भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४१ ॥
रज्जावहिरिव शुक्तौ रजतमि-
व त्वयि जगन्ति भान्ति विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४२ ॥
लब्ध्वा भवत्प्रसादाच्चक्रं
विधुरवति लोकमखिलं भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४३ ॥
वसुधातद्धरतच्छयरथमौ-
र्वीशर पराकृतासुर भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४४ ॥
शर्व देव सर्वोत्तम सर्वद
दुर्वृत्तगर्वहरण विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४५ ॥
षड्रिपुषडूर्मिषड्विकारहर
सन्मुख षण्मुखजनक विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४६ ॥
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मे-
त्येतल्लक्षणलक्षित भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४७ ॥
हाहाहूहूमुखसुरगायक-
गीतापदानपद्य विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४८ ॥
ळादिर्न हि प्रयोगस्तदन्त-
मिह मङ्गळं सदास्तु विभो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ४९ ॥
क्षणमिव दिवसान्नेष्यति त्वत्पद-
सेवाक्षणोत्सुकः शिव भो ।
साम्ब सदाशिव शंभो शंकर
शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ ५० ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ
सुवर्णमालास्तुतिः संपूर्णा ॥
The Works of Sri Sankaracharya, Volume 17 (Stotras, Vol. 1), Sri Vani Vilas Press, 1910
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