गायत्री चालीसा
चालीसा · 🌅 गायत्री माता · Hindi · ⏱ 3 min
अन्य नाम · Also known as गायत्री चालीसा · Gayatri Chalisa
दोहा
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ह्रीं श्रीं कलीं मेधा प्रभा जीवन जयोति प्रचंड ।
शान्ति कान्ति जागृति प्रगति रचना शक्ति अखंड ॥१॥
जगतजननी मंगलकरनी गायत्री सुखधाम ।
प्रणवो सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम ॥२॥
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भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी, गायत्री नित कलिमल दहनी ॥
अक्षर चौवीस परम पुनिता, ईनमें बसें शास्त्रश्रुति गीता ॥
शाश्र्वत सतो गुणी सतरुपा, सत्य सनातन सुधा अनुपा ॥
हंसारुढ सितम्बर धारी, स्वर्ण कान्ति शुचि गगन बिहारी ॥
पुस्तक पुष्प कमंडलु माला, शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ॥
ध्यान धरत पुलकित हित होई, सुख उपजत दुख दुरमति खोई ॥
कामधेनु तुम सुर तरु छाया, निराकार की अदभूत माया ॥
तुम्हारी शरण गहै जो कोई, तरे सकल संकट सों सोई ॥
सरस्वती लक्षमी तुम काली, दीपै तुम्हारी जयोत निराली ॥
तुम्हारी महिमा पार न पावै, जो शारद शत मुख गुन गावै ॥
चार वेद की मातु पुनिता, तुम ब्रमाणी गौरी सीता ॥
महामंत्र जितने जग मांही, कोऊ गायत्री सम नाही ॥
सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै, आलस पाप अविध्या नासै ॥
सृष्टि बीज जग जननी भवानी, काल रात्रि वरदा कल्याणी ॥
ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते, तुम सों पावें सुरता तेते ॥
तुम भक्तन की भकत तुम्हारे, जननीहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ॥
महिमा अपरंपार तुम्हारी, जय जय जय त्रिपदा भयहारी ॥
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना, तुम सम अधिक न जगमे आना ॥
तुमहिं जानि कछु रहे न शेषा, तुमहिं पाय कछु रहै न कलेशा ॥
जानत तुमहिं तुमहिं है जाई, पारस परसि कुधातु सुहाई ॥
तुम्हरि शकित दीपै सब ठाई, माता तुम सब ठौर समाई ॥
ग्रह नक्षत्र ब्रह्मांड घनेरे, सब गतिवान तुम्हारे प्ररे ॥
सकल सृष्टि की प्राण विधाता, पालक पोषक नाशक त्राता ॥
मातेश्वरी दया व्रत धारी, तुम सन तरे पातकी भारी ॥
जापर कृपा तुम्हारी होई, तापर कृपा करे सब कोई ॥
मंद बुद्धि ते बुद्धि बल पावें, रोगी रोग रहित हो जावे ॥
दारिद्र मिटै कटै सब पीरा, नासै दुःख हरे भव भीरा ॥
गृह कलेश चित चिंता भारी, नासै गायत्री भय हारी ॥
संतति हीन सुसंतति पावें, सुख संपत्ति युत मोद मनावें ॥
भूत पिशाच सबै भय खावें, यम के दूत निकट नहि आवें ॥
जो सधवा सुमिरे चित लाई, अक्षत सुहाग सदा सुखदायी ॥
घर वर सुख प्रद लहै कुमारी, विधवा रहै सत्य व्रत धारी ॥
जयति जयति जगदंब भवानी, तुम सम और दयालु न दानी ॥
जो सदगुरु सों दीक्षा पावें, सो साधन को सफल बनावे ॥
सुमिरन करे सुरुचि बडभागी, लहै मनोरथ गृहि विरागी ॥
अष्ट सिद्धि नव निधि की दाता, सब समर्थ गायत्री माता ॥
ॠषि मुनि जती तपस्वी जोगी, आरत अर्थी चिंतित भोगी ॥
जो जो शरण तुम्हारी आवें, सो सो मन वांछित फल पावें ॥
बल बुद्धि विध्या शील स्वभाऊ, धन वैभव यश तेज उछाऊ ॥
सकल बढै उपजे सुख नाना, जो यह पाठ करै धरि ध्याना ॥
यह चालीसा भक्तियुत पाठ करे जो कोय, तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥
ॐ भूभुर्वः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
गुजराती विकिस्रोत — "गायत्री चालीसा" (ગાયત્રી ચાલીસા), Aarti Bhajan Stotra.pdf, संस्करण 204058. मूल गुजराती लिपि से देवनागरी में लिप्यंतरित। CC BY-SA 4.0.
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