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ब्रह्मलीला

Brahmalila

भजन · Hindi · ⏱ 6 min

अन्य नाम · Also known as ब्रह्मलीला · Brahmalila

अक्षर का आकार

चोखरो-१
(राग:सामेरी)
ॐ नमो आदि निरंजन राया, जहां नहि काळ कर्म अरू माया;
जहां नहि शब्द उच्चार न जंता, आपे आप रहे उर अंता(अंदर).
"छंद"
उर अंतरमें आप स्वबस्तु, ढिग(पासे) नहीं माया तबें(त्यारे);
अन्य नहि उच्चार करिवे, स्वस्वरूप होहीं जबें(ज्यारे).....१
मिथ्या माया तहां कल्पित, अध्यारोप किनो सही;
अर्द्धमात्रा स्वभाव प्रणव सो, त्रिगुण तत्व माया भइ.....२
आप ज्यौं के त्यौं निरंजन, सर्व भाव फेली अजा(माया);
ज्यों चुंबक देखकें लोह चेतन, त्यौं दृष्टोपदेश पाइ रजा.....३
परम चैतन आदि निरंजन, अकरता पद सो सदा;
अजा अल्प अर्वाक(अर्वाचीन) अंजन(मेल), भो(थयुं) जगत पलमें तदा(त्यारे).....४
सगुणब्रह्म सो स्तुति पदारथ, दृष्ट पदारथस्वामिनी(वस्तुनां मालीक);
अखा ब्रह्म चैतन्यघनमें, भइ अचानक दामिनी(वीजळी).....५
चोखरो-२
ऐसें आप सगुनब्रह्म स्वामी, ऐसें ही अंश भयो बहुनामी;
आप फ्लाव किनो गृहि माया, सहज भोग करि सुत तीनुं(त्रण) जाया(उपजाव्या).
"छंद"
जाये तीन सुत जगतकारन, सत्व रज तमसादि भये;
पंचभूत अरू पंचमात्रा, तमोगुन केरे कहे.....१
देव दश अरू उभय इंद्रिय, बेग(शीघ्र) उपजे रजहींके;

भये चतुष्टय सत्वगुनके, काम दिनो कर अजहींके.....२
रजोगुन सो आप ब्रह्मा, तमोगुन सो रूद्र हे;
सत्वगुन सो विष्णु आपे, सगुनब्रह्म पहुंची चहे.....३
चार पंचक अरू चतुष्ट्य, एक प्रकृति मूलकी;
आपको परिवार बढायो, भइ माता श्थुल की.....४
चली आवे कला चिद्की, बन्यो पुरूष विराट ए;
कहे अखा माया कहो के, कहो परब्रह्मघाट ए.....५
चोखरो-३
ऐसेइ अंश चल्यो अविनाशी, ताकी भांति भइ लक्ष चोराशी;
निर्गुण ब्रह्म सगुन भयो ऐसें, ताकों ओर कहींजे कैसें.
"छंद"
ओर नहि कोइ कल्प हरितें, ज्यां पानिको पाला(बरफ) भयो;
जोइ निर्गुन सोइ सगुन हे, नामरूप आपें नयो.....१
नाम नहिं ताके नाम सब हे, रूप नहिं ताके रूप सबें;
कारज कारन और नांहीं, रूप अरूपी व्हैं(थइने) फ्रबे(शोभे).....२
सगुन बेत्ता निर्गुनको हे, निर्गुन पोषक सगुनको;
ज्यौं पुरूषकी परछांहि दर्पन, आनन(मुख) समर्यो जंनको.....३
जडको रूप चैतन्य लीनो, चैतन्य ज्योंको त्यों सदा;
रूपबिना खेल फ्बुत(शोभतो) नांहीं, आप बन्यो अपनी मुदा(प्रसन्नताथी).....४
सहज इच्छा बानक(रचना) बन्यो हे, अन्य नहि कोउ आपतें;
कहे अखा अहंकृति दुजी, मान लीनी व्यापतें.....५
चोखरो-४
ऐसो रमन चल्यो नित्य रासा, प्रकृति पुरुषको विविध विलासा;
जेसें भींत रची चित्रशाला, नाना रूप लखे ज्यों विशाला.
"छंद"
बिशाल दर्पन भींत कीनि, ओर स्वच्छ सत्य स्वामिनी;

ताहीके मध्य भांती भासी, वेसि सत्य सुहावनी(शोभती).....१
त्यों अजाक मधि भांती नाना, वस्तु विशेषहीं भासी हे;
आत्मा अकर्ता अभोग अवयव, जानत जीव विलासी हे.....२
प्रकृति पुरुषके जोग जंतुन, मिथ्या पुरुष प्रकट भयो;
सो आध नाहीं अंत्य नाही, मध्य मानि तापें रह्यो.....३
संशय मिथ्या विपरीतभावना, जब लगी जो नर करै;
तबलगी नाना देह धरहीं, मायामें उपजै मरै.....४
पिंड पर सो मोह पायो, पुरंजन तातें भयो;
कहे अखा यह जीवौत्पत्ति, मान मिथ्या ले रह्यो.....५
चोखरो-५
सदा सर्वदा नाटक माया, नाटक चले देखे परब्रह्म राया;
सो सब ले अपने शिर जंता, तातें न आवहीं जीवको अंता.
"छंद"
अंत न आवहीं कृत्य भावहीं, रंजना(प्रीती) देहसों सदा;
में ममता कर आप पोखे, त्यों त्यों मन पावै मुद्दा.....१
स्वरूप जेसो पुत्र वंध्या, कर्म नित ऐसें करे;
आकाशकी नित्य मोट(पोटली) बांधे, भंडार ले अपना भरे.....२
अजाये(नहि जन्मेलां) नर सुभट योद्धा, ताहीकी सेना रची;
गांधर्वनगरी जीतिवेकों, चले राय सुंदर शुची.....३
जय पराजय नित्य पावे, हर्ष शोक ह्रदे विषे;
तन मनके आनंद कारन, कर्ममादक नित भखे.....४
असंभावना(संशय) विपरीतभावना, ताहीके हियमें रही;
कहे अखा ए जीवनलच्छन, उत्पत्ति स्थिति वाकी कही.....५
चोखरो-६
होता नहीं अबें नाहीं आगें, मिथ्या भ्रम भ्रमिवेकों(भमवा माटे) लागे;
ज्यौं देहके संग छाया होइ, सो मिथ्या नां सांची(सत्य) सोइ.
"छंद"
नांहीं मिथ्या नांहीं सांचो, रूप ऐसो जीवको;

जन्म मरन औ भ्रमन संशय, चल्यो जाइ सदैवको.....१
ताही अचानक चेतना जब, उपजें नरके विषे;
जन्म मरन औ भोग सुख दुःख, काल कर्म फलकों लखे.....२
यही बिचार गुरुतें आयो, आतुरता उपजी खरी;
चरनकमल पर शीश धरके, सेवा स्तुति अतिशय करी.....३
कीनी जु नवधा भक्ति भावैं, अधिकारपरते गुरु कही;
प्रेमातुर वैराग केवल, जेसी कही तेसी ग्रही.....४
कहे अखा महावाक्य गुरु को, ऊग नीकसे आपसें;
ज्ञानअर्ककी जोन्हसों(जेवडे) कर, रह्यो नहि मन मापसें.....५
चोखरो-७
जैसे अंड पिंड फूटैं विहंगा(पक्षी), और रूप भयो ओरही रंगा;
आगें अंडमध्य गंदा पानी, चलन हलन ताकी कोमल बानी.
"छंद"
बानी कोमल अंग खेचर(पक्षी), भूचरभावना सब टरी;
तेसें जंत प्रसाद गुरु तें, अहंता अपनी गिरीं.....१
यथारथ स्वस्वरूप हरिको, हरिजनके उरमें बस्यो;
सांख्ययोग सिद्धांत पायो, कह्यो गुरु त्यां अभ्यस्यो(अभ्यास).....२
तत्वमसि जो बाक्य श्रुतिको, गुरुकृपातें सो भयो;
आध जीव मिथ्या कह्यो, तब ऐसेंको ऐसो कह्यो.....३
आप परबिन खेल देख्यो, नित्य नाटक संभ्रमैं;
अरूपमध्य स्वरूप भास्यो, ज्यों पुतरिका(पुतळी) खंभमें.....४
यह अखा ऐसोइ जाने, ताइके घट उपजै;
जैसे को तैसो भयो जब, मध्यतें अहंता तजै.....५
चोखरो-८
महाजन जाने महाकल(युक्ति) भेवा(भेद), जो परब्रह्म पर्यो सत्यमेवा;
ज्यां चुंबकतें चेतन भयो लोह, जीवपनो ताको यों खोहा(खोवायुं).
"छंद"
खोहा गयो बिच बल अजाको, ताहीतें चेतन भयो;

अंधा अचानक नेंन पायो, द्वंद्व बिचतें टर गयो.....१
स्तुति पदारथ नयन देख्यो, दृष्ट पदार्थ गया बिला(विलीन);
मिटी देहकी भावना अब, स्वयं चैतन व्है चला.....२
ध्येय ध्याता अरू करन कारन, मायाके मध्य जो सही;
रज्जु लगी सो भुजंग भ्रम हें, बिन रज्जु केसो अही.....३
प्रीछीवेको प्रताप बडहे, जानही बिरला जना;
आगें पाछें ओर नांही, आप बिलस्या आपना.....४
कहे अखा ए ब्रह्मलीला, बडभागी जन गायगो;
हरि हीरा अपने ह्रदय में, अनायाससों पायगो.....५
'श्रीब्रह्मलीला संपूर्ण'

स्रोत · Source

गुजराती विकिस्रोत — "ब्रह्मलीला" (બ્રહ્મલીલા), Dohavali and Anya pado.pdf, संस्करण 208115. मूल गुजराती लिपि से देवनागरी में लिप्यंतरित। CC BY-SA 4.0.
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