अर्गलास्तोत्रं
स्तोत्र · 🌺 माँ दुर्गा · Sanskrit · ⏱ 3 min
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अथार्गलास्तोत्रम्
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुऋषिः अनुष्टुप छन्दः श्रीमहालक्ष्मीर्देवता श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ॥
ॐ नमश्चण्डिकायै ॥
मार्कण्डेय उवाच
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ॥१॥
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तुते ॥२॥
मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥३॥
महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥४॥
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥५॥
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥६॥
वन्दिताङघ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥७॥
चिन्त्यरुपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥८॥
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरिताषहे ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥९॥
स्तुवदभ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१०॥
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥११॥
देहि सौभाग्यंमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१२॥
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१३॥
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम् ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१४॥
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१५॥
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१६॥
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१७॥
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१८॥
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१९॥
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२०॥
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२१॥
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२२॥
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२३॥
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ॥२४॥
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः ।
स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम् ॥२५॥
इति देव्या अर्गलास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
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