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अन्नपूर्णाष्टकम्

Annapurna Ashtakam

अष्टकम् · 🌺 देवी · Sanskrit · ⏱ 1 min

अन्य नाम · Also known as अन्नपूर्णाष्टकम्

Sanskrit text attributed to आदिशङ्कराचार्यः from The Works of Sri Sankaracharya, Volume 18 (Stotras, Vol. 2), Sri Vani Vilas Press, 1910.

अक्षर का आकार

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी
निर्धूताखिलदोषपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।
प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ १ ॥

नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी
मुक्ताहारविडम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी ।
काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ २ ॥

योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मैकनिष्ठाकरी
चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।
सर्वैश्वर्यकरी तपःफलकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ३ ॥

कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी ह्युमाशांकरी
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ह्योंकारबीजाक्षरी ।
मोक्षद्वारकवाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ४ ॥

दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी
लीलानाटकसूत्रखेलनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।
श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ५ ॥

आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शंभुप्रिया शांकरी
काश्मीरत्रिपुरेश्वरी त्रिनयनी विश्वेश्वरी शर्वरी ।
स्वर्गद्वारकवाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ६ ॥

उर्वीसर्वजनेश्वरी जयकरी माता कृपासागरी
नारीनीलसमानकुन्तलधरी नित्यान्नदानेश्वरी।
साक्षान्मोक्षकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ७ ॥

देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी
वामा स्वादुपयोधरा प्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।
भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ८ ॥

चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशी चन्द्रांशुबिम्बाधरी
चन्द्रार्काग्निसमानकुण्डलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।
मालापुस्तकपाशसाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ९ ॥

क्षत्रत्राणकरी महाभयहरी माता कृपासागरी
सर्वानन्दकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरी श्रीधरी ।
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ १० ॥

अन्नपूर्णे सदापूर्ण
शंकरप्राणवल्लभे ।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं
भिक्षां देहि च पार्वति ॥ ११ ॥

माता च पार्वतीदेवी
पिता देवो महेश्वरः ।
बान्धवाः शिवभक्ताश्च
स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥ १२ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ
अन्नपूर्णाष्टकं संपूर्णम् ॥

स्रोत · Source

The Works of Sri Sankaracharya, Volume 18 (Stotras, Vol. 2), Sri Vani Vilas Press, 1910
Ambuda — CC0 texts · Public domain
Sanskrit text from the Ambuda library (ambuda.org), released under CC0 1.0.

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